लिखना तो बहुत चाहता हूं, पर समय की पाबंदी एवं जमाने की गर्दिश लिखने ही नहीं देती, पर इसके बावजूद भी अगर समझ नहीं आता है, तो अपनी लेखनी को विराम भी नहीं दे पाता हूं, फिर क्या लेखनी अपने रास्ते में मुझे खींचती चली जाती है!
पर यह भी समझ नहीं आता है शुरुआत कहां से करूं क्या लिखूं ? इसीलिए किसी कवि या यूं कहें कि किसी शायर की उक्ति से ही अपने लेख की शुरुआत या श्री गणेश करता हूं !
" लिखो तो कुछ ऐसा लिखो....
कि कलम रोने पर मजबूर हो जाए,
लेखनी में वह दर्द पैदा करो, की गजल बनने पर मजबूर हो जाए...."
कहते हैं कि दुनिया बहुत ही सुंदर है, सच है ! परंतु यह भी सच है क्योंकि, इससे बढ़कर इस ब्रम्हांड में अब तक के ज्ञात साक्ष्यों के अनुसार पृथ्वी से सुंदर जगह भी नहीं है !
अब जब पृथ्वी से सुंदर जगह है ही नहीं तो सब सुंदरता भी यही होगी, क्योंकि कहा गया है कि "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है !"
अर्थात जब यह धरती सुंदर है तो इस पर विचरण कर रहे प्राणी भी सुंदर ही होंगे, यदि सुंदर नहीं है तो बनने का प्रयास तो करेंगे ही, क्योंकि यह भी कहा गया है कि :-"जिसको जितना मिलता है वह उससे ज्यादा की अपेक्षा करता है !" और यह सभी सजीव पर लागू होता है !
[ निर्जीव की तो बात ही नहीं क्योंकि इस निर्जीव का भी निर्जीव होने के पीछे बहुत ही बड़ा राज है, और यह कहने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं होगी कि यह भी कभी जीव धारण करता था और इसकी भी कुछ अपनी इच्छाएं तथा आशाएं होंगी जब यह जीव धारण किया करता होगा ! ]
जब यह सभी सजीव पर लागू होता है तो इस सजीव की श्रेणी से हम या आप या और भी कोई बाहर कहां है ? नहीं ना !
अब देखिए ना इस मनुष्य के बारे में तो आपने जरूर ही सुना होगा कि कितने कठोर और कितने दयालु होते हैं !जब हम मनुष्य की बात करें तो सबसे पहले हमें मानवता की बात करनी होगी ! मानवता की बात करें, तो यह है क्या, यह भी एक गंभीर समस्या है, आज के लिए ! क्योंकि लोग मानवता का मतलब ही नहीं समझते यदि जानते भी हैं तो उसे अमल में लाना ही नहीं चाहते !
मैं पूछना चाहता हूं क्यों, आखिर हो क्या गया है इस मनुष्य रुपी पालतू जानवर को ?
मुझसे यदि कोई पूछे कि मानवता का क्या अर्थ होता है ? तो मैं कहूंगा की :---
" सच्चे मन से किसी के हित के लिए किसी की अहित ना हो को ध्यान में रखकर निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य ही मानवता की सच्ची परिभाषा है !"
अतः यह परिभाषा कहना तो एकदम कड़वा होगा हमारी धरती पर विचरण कर रहे 70 प्रतिशत मनुष्य रुपी पशु के लिए, पर क्या करें जो सच्चाई है वह तो है !
यूं तो अनेकों लेखक इस मनुष्य का विभाजन अनेकों तरह से किए हैं ! पर मेरे अनुसार मनुष्य को सिर्फ दो वर्गों में ही विभाजित करना उचित रहेगा !
1 कर्मावलंबी
2 धर्मावलंबी
1 कर्मावलंबी :- कर्मावलंबी मनुष्य की बात करें तो यह तो परिभाषा सही स्पष्ट हो जाती है, जो कि हम लोगों ने पहले ही जिक्र कर लिया है !
लगे हाथ हम लोग एक उदाहरण देख लें तो मजा आ जाए और फिर उदाहरण के ही सहारे धर्मावलंबी भी देख लेंगे....
मेरा एक दोस्त है जिसके बारे में ज्यादा कुछ तो पता नहीं जहां तक मेरी जानकारी में है कि वह बहुत ही साहसी है और हो भी क्यों ना क्योंकि हमारे यहां जब बच्चे जन्म लेते हैं उसी समय से बच्चे में संस्कार नामक मिश्री घोली जाती है ....
2 धर्मावलंबी :- " बड़ों का सम्मान करो, किसी का अनादर मत करो, नि:सहाय की सेवा करो, निस्वार्थ भाव से ! मित्र की मदद करो, एक दूसरे के काम में हाथ बटाओ इत्यादि !
पर जब बच्चे यह करने लगते हैं तो हम ही उन्हें यह करने से मना करते हैं, क्यों ? क्योंकि हम उससे स्वार्थ चाहते हैं, और यह चाहते हैं, की यह सिर्फ मेरी सुने और मेरी करें, इसी बात को सुनते, देखते, करते बच्चे धर्मावलंबी बन जाते हैं ! और हम इसके कारण बनकर समाज में हो रही बुराइयों को झेल रहे होते हैं ! अतः हम ही उन्हें बुराई करना भी सिखाते हैं !
अंत में मैं आपसे यह अनुरोध करता हूं कि आप भी मानवता के मूल को अपनाकर अपने जीवन को हमेशा सार्थक बनाने का प्रयास करें !
बहुत खूब कमल बाबू आपने जीवन की सच्चाई को काफी निकट से व्यक्त किया है
ReplyDeleteधन्यवाद भ्राता श्री !
DeleteNice line sir.
ReplyDeleteThanks
DeleteAwesome awesome awesome, try to spread the lesson humanity among all which will promote u to go so long. ...
ReplyDeleteThanks a lot
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ReplyDeleteThanks 'PRABHAT'
ReplyDeleteबहुत अच्छा कविता लगा।
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteVery very truely line I really like it and very use full
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